आधुनिक कामकाजी महिलाएँ : व्यथा की कथा

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अर्थात्‌ एक ऐसे अनुष्ठान का दिन जब विश्वभर की आधी आबादी की आर्थिक, सामाजिक, अर्थशास्त्रीय, राजनीतिक, शैक्षणिक हैसियत पर चर्चा होती है, विमर्शर् होते हैं, अरण्य रोदन होते हैं और सपने देखे- दिखाये जाते हैं अर्थात्‌ कुछ कड़वा कुछ मीठा।

विज्ञान, उद्योग, सेना और अंतरिक्ष में उनकी पैठ पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता है। इस दिन उनकी बढ़ती असुरक्षा, उनके साथ उत्पीड़न, उनके स्वास्थय और उनकी रक्षा के लिये बनें सैकड़ो कानुनों का जिक्र होता है।

शिक्षा के विस्तार, सामाजिक जागरण और बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताओं के कारण आज की  नारी को परिवार चलाने के लिये, आर्थिक समस्याओं की पूर्ति के लिये, अपनी प्रतिभा के उपयोग की दृष्टि से और निजी पहचान की चाहत से घर से बाहर निकलना आवश्यक है। आर्थिक सुदृढ़ता आज सम्मान का आधार भी है। यह अहम्‌ वज़हे हेें जो नारी के घर से बाहर निकलने की कारक है। हमारा विषय कामकाजी महिलाओं की व्यथा पर केन्द्रित है। काम कई प्रकार के हैं। शिक्षिका, नर्स, कार्यालयों में काम तो वर्षों से चल रहा है। पढ़ी लिखी महिलाओं की पहली पसंद थे यह कार्य। निरक्षर महिलाएं मजदूरी, खेतों में काम, सिलाई आदि का  कार्य करती रही हैं। समय के साथ ऊंचे शासकीय पदों पर  कार्य करने वालीं, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखिकाएं शोध कार्य करने वाली, फिल्मों और टी.वी. पर काम करने वाली अदाकारा, संगीत और अन्य ललित कलाओ की साधिकाएँ आदि भी कामकाजी महिलाओं की श्रेणी में आती हैं। रिक्शा चलाना, ट्रक चलाना, सैन्य जगत के जोखिम भरे कार्य भी महिलाऍ करती हैं। अपवादों को छोड़ दिया जाये तो सभी को घर और बाहर के क्षेत्रों में सामांजस्य बिठाना होता है। रिश्तेदारी, पारिवारिक उत्सव जैसे विवाह आदि, बारहमासों के पर्व-उत्सव, मेहमाननवाजी, बिमारी आदि उसकी परीक्षा के दौर होते हैं। परिवार जन उसकी व्यवस्तता को देखकर उचित सहयोग करें तो यह अवसर व्यथा की कथा नही रहते वरन्‌ नारी की प्रतिभा को निखारते हैं और उसकी क्षमताओं को बढ़ाते हैं, फलस्वरूप एक अच्छे समाज की रीढ़ मजबूत होती है।

इस उज्जवल पक्ष के साथ कामकाजी महिलाओं के जीवन का स्याह पृष्ठ भी है जिसे सभी जानते है और वह पृष्ठ ‘उत्पीड़न’ के नाम से जाना जाता है। कामकाजी महिला की व्यथा का यह उत्पीड़न 90 प्रतिशत के लगभग है। कार्यस्थल तक जाना और वहॉ छ: से आठ घण्टे व्यतीत करना एक चुनौती है उसके लिये। न चाहते हुए भी अवांछित, अकारण अपमान के घूंट वह पीती है। चपरासी से लेकर बॉस तक पुरूष समाज महिला को सिर्फ  ‘महिला’ मानता है। अपवादों को छोड़कर यह स्थिति सर्वत्र है। कुछ माह पहले ‘मी टू’ शब्द हमारे पढ़ने में आया, जिसका अर्थ है मैं भी प्रताड़ित महिलाओं में से एक हूँ। अच्छे परिवारों की ऊँचे पद पर आसीन सामर्थ्यवान महिलाएं इस त्रास से गुजरती हैं तो सामान्य महिलाओं की क्या कल्पना की जाये? उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं। सोशल और प्रिन्ट मीडिया में आये दिन आने वाली खबरों में प्रमाण उपलब्ध है।

कई सामाजिक संस्थाएं, साहित्यकार, कुछ दशक पहले तक की फिल्मों में इस समस्या को आवाज देने का कार्य हुआ है। हमारे समाज सुधारक, साहित्यकार और निर्देशक संदेश देने में सफल भी रहें है परन्तु समस्या आबादी के बढ़ने की तरह ही बढ़ती जा रही है। पुरूष प्रधान समाज में उत्पीड़न करने वाले घटक कानून की गिरत में नहीं आ सकते। महिलाऍ समझते हुए भी बात बढ जाने के डर से, समाज में हल्ला मचने के डर से, कोर्ट- पुलिस की लेट लतीफी में समय और पैसे की बर्बादी के डर से मौन रह जाती है। अब प्रश्न यह है कि इस व्यथा का कहीं अंत है भी या नहीं? विमर्श कहते हैं कि स्वस्थ मानसिकता वाले समाज में ही इस समस्या का निदान हैं। स्वस्थ मानसिकता सतत निगरानी, सतत प्रयास, नारी का स्वयं की मानसिंक सशक्तता, शारीरिक बल, स्वरक्षा के लिये नियत कराटें आदि में दक्षता, कानुनों का ज्ञान, शिकायतो का प्रामाणिक बनाने के लिये आवश्यक सजगता, सामान्य हथियार चालन में दक्षता सरल कानून, त्वरित न्याय, सस्ता न्याय, नीडरता, आत्मविश्वास आदि प्रकल्प कुछ सीमा तक सामने वाले व्यक्ति  के मन में भय का सृजन कर सकते हैं और कुछ सीमा तक इसका हल निकल सकता है। आइये इस दिवस पर हम स्वस्थ मानसिकता वाले समाज निर्माण के लक्ष्य को लेकर चलें और आधी दुनिया को सम्मान देते हुए भय विहीन समाज का निर्माण करने में अपनी छोटी सी आहुती दें।

 

– डॉक्टर जया पाठक, थांदला

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