ज्ञाति गौरव : श्रीमती ममता शर्मा : एक साक्षात्कार

श्रीमती ममता शर्मा (पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग) सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में सुपरिचित व्यक्तित्व की धनी हैं।

श्रीमती शर्मा पूर्व कोटा राज्य के राजगुरू बड़े देवताजी श्री श्रीधरलाल जी एवंश्रीमती पुष्पादेवी की पुत्री हैं। अपने दो बड़े भाइयों श्री श्रीकान्त जी एवं शिवकान्त जी के स्नेह में बड़ी हुईं और अपना अपूर्व स्नेह छोटे भाई श्री चन्द्रकान्त जी के साथ बांटा।आपने अपने अध्ययन काल में ही कोटा के सोफिया स्कूल, महारानीज्‌ गर्ल्स स्कूल, जे. डी. बी. कालेज में अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी है।

1974 में इनका विवाह बून्दी के प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और राजस्थान सरकार में कई विभागों के मन्त्री रहे पं. बृजसुन्दर जी शर्मा के सुपुत्र श्री कमलाकर जी के साथ हुआ।

अबकी बार इनके कोटा आगमन पर समाज में स्त्रियों की स्थिति पर विस्तृत बातचीत का अवसर प्राप्त हुआ। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश-

आज के समय में तो परिस्थितियां बदली हैं लेकिन एक परम्परागत परिवार से होने पर भी आप इन ऊंचाइयों पर पहुँची हैं। आप यह सब किस प्रकार कर सकीं ?

मैंने जन्म तो ऐसे घर में लिया जहां सामन्तवाद था क्योंकि मेरे पिता कोटा रियासत के राजगुरू थे लेकिन साथ ही साथ वे कोटा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रारम्भिक संस्थापकों में भी थें। परिस्थितियां बदली मेरा विवाह स्वतन्त्रता सेनानी और कांग्रेस के दिग्गज नेता स्व. पं.बृजसुन्दर जी शर्मा के सुपुत्र श्री कमलाकर शर्मा के साथ 24 जून 1974 में हुआ। मैं तो गृहणी ही थी और उम्र भी अधिक नहीं थी लेकिन मुझे सास ससुर का भी उतना ही प्यार मिला जितना माता पिता से मिलता रहा था। मेरे पिता ने मुझे लड़कों की तरह ही पाला, जितनी क्षमता व सम्बल उनको दिया उतना ही मुझे भी दिया चाहे वह कार चलाना हो, तैराकी हो, निशानेबाजी हो या और इस तरह की गतिविधियां हों।

एक समय ऐसा भी आया जब मुझे मेरे ससुर जी ने राजनीति से जोड़ दिया। हालांकि रास्ता आसान और सीधा नहीं था लेकिन उनका सपना था कि वे मुझे किसी ओहदे पर देखना चाहते थे। कई लोगों के प्रश्न थे कि तीन लड़कों के होते हुए बहू क्योें? पर आज हम जिस महिला शक्तिकरण की बात कर रहे हैं वह सोच उनके पास 35 साल पहले ही थी कि केवल पुरुष ही क्यों? महिला भी उतनी ही सक्षम होती है।पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी होने पर भी कई बार उस समय की सामाजिक व्यवस्था में सामंजस्य बैठाने में भी तो कठिनाइयां आईं होंगी?

कठिनाइयां तो मुंह बाए खड़ी रहती हैं लेकिन काका स्व. श्री हरिकुमार जी औदीच्य, आदरणीय बाबूजी (बृजसुन्दरजी) और आदरणीय दाता (देवताजी) तीनों ने हिम्मत दिलाने में कसर नहीं छोड़ी। पुरुष प्रधान देश है और समाज भी, घर की मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए मैं मैंदान में उतरी, पहला टिकिट 1993 में मुझे बून्दी से मिला पर इस चुनाव में मैं हार गयी ।

 

राजनीति में फिर भी तो बहुत संघर्ष करना पड़ा होगा?

सही है, भले ही मैं चुनाव हार गयी थी ल्ेकिन हिम्मत बहुत बढ़ गयी थी और पुरुषों के बहुत विरोध के बावजूद भी इस क्षेत्र में काम करती रही और अगला चुनाव 1998 में 22000 वोटों से जीती, विधान सभा में पहुंची। तीसरा चुनाव मैं फिर जीती। खास बात यह भी रही कि उस बार
विधानसभा में कांग्रेस की 56 सीटें ही थीं और मैं अकेली ही महिला जीत कर गयी थी। पुरुषों की ओर से खिलाफत होती थी। किसी भी महिला के लिए कुछ भी बोल देना लोगों की फितरत होती है फिर भी मैंने सच्चाई और ईमानदारी से निष्ठापूर्वक कार्य किया।

 

राजनीति की इतनी व्यस्तता में भी आप परिवार के लिए किस प्रकार समय निकाल पाती होंगी?

बच्चे छोटे थे लेकिन संयुक्त परिवार के बहुत लाभ होते हैं, ये कब बड़े हुए? पता ही नहीं लगा। घर देखना, परिवार देखना, राजनीति भी कर लेना यह क्षमता महिला में ही हो सकती है। मुझे माननीया सोनिया गांधी जी का बहुत सम्बल मिला उन्हीं के आशीर्वाद से मैं राष्ट्रीय पद पर पहुंची।

 

आधी आबादी महिलाएं आज भी पिछड़ी हुई दिखती है। इस पर आपको कैसा लगता है?

वर्तमान परिस्थितियों में महिलाओं को अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी होगी, महिला- पुरुष के भेद को समाप्त करना होगा। उन्हें अपनी पारिवारिक परिस्थितियों और अपने परिवार के सम्मान को देखते हुए घर से बाहर आना ही चाहिए। अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहना होगा, अपने आत्मसम्मान की रक्षा स्वयं करनी होगी, डरने से काम चलने वाला नहीं है। अपने परिवार, बड़ों का ध्यान रख कर राजनीति में महिलाओं के हितों के लिए संघर्ष करना ही होगा।

वर्तमान में महिलाओं की दशा वो नही है जो हमें दिखाई देती है। इस देश की आबादी का 50 प्रतिशत हिस्सा महिलाऐं हैं। जो महिलाऐं सामने दिखाई दे रही हैं वेा मुट्‌ठी भर हैं। लेकिन जो दूर दराज गांवो में बैठी हुई है उनकी दशा में कोई सुधार नहीं आया है। उनमें शिक्षा की कमी के
कारण उनको उनके अधिकारों के बारे में उनकी सुरक्षा के बारे मे कोई ध्यान नहीं है।

 

आपका महिलाओं के लिये कोई सन्देश ?

में आपस की निन्दा समाप्त करनी होगी । किसी महिला पर कीचड़ उछालने वालों को सबक सिखाना होगा। कुरीतियों से बचाना होगा। डायन प्रथा, सती प्रथा, घरेलू हिंसा आदि से बचाना होगा।

उनको एक दिशा देनी होगी जो बिना शिक्षा के सम्भव नहीं है। गावों मे आज भी बाल विवाह , कन्या भू्रण हत्या होती है जिसे खत्म करना होगा। हमारे देश की महिला बहुत सहनशील होती है। यह उसका स्वभाव है कि सबको मिलाकर चलना चाहिये लेकिन एक हद तक महिला को सहन करना चाहिये। अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिये कोई भी नेता अफसर, या परिवार का मुखिया ये न समझे कि आज भी महिला गुलामी की जंजीरों मेंं जकड़ी हुई है। अपने आत्म सम्मान की रक्षा स्वयं करनी चाहिये। मैं महिलाओं को यही सन्देश देना चाहूॅगी कि हिम्मत रखना, निडर रहना अपने जीवन में उतार कर रखे। रात के बाद दिन अवश्य होता है। नारी को देश में देवी का स्थान दिया गया है उसे चरितार्थ करने में हमें उदाहरण बनना चाहिये । अपने पैरों पर खड़े होना चाहिये किसी पर आश्रित नहीं रहना चाहिये । आपको लोग सम्पूर्ण भारतीय नारी के रूप मेें देखें अपने भाईयो के साथ कन्धे से कंधा मिलाकर कार्य करें। अपना नाम रोशन करें।

 

– श्रीमती सीमा भारद्वाज, कोटा

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