मां से मॉम का सफर

बसन्त पंचमी के शुभ अवसर पर आंगन को रंगोली और फूलों से सजाने का काम समय पर पूरा करने के लिए अपनी पीठ थपथपा कर अभी बैठी ही थी कि दरवाजे से किसी ने आवाज दी नमस्ते दीदी

मैंने कहा अरे सुजाता अंदर आ जाओ . मैंने तुमको पहचाना ही नही्‌ं। तुम तो बदल गई हो। तुम्हारी लंबी चोटी, हैंडलूम की साड़ी और माथे पर लगी वह लाल बिंदी गायब हो गई है ।आज तुम्हारे रंग रूप एकदम अलग दिख रहे हैं । यह टीशर्ट, जींस, कटे हुए छोटे-छोटे बाल, इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया?

सुजाता थोड़ी सी कन्फ्यूज्ड लगी और उसने टी-शर्ट को नीचे खींचने की व्यर्थ कोशिश भी की परन्तु वह कुछ और ही ज्यादा छोटा था। फिर उसने जो कहा वह तेज गति से बदलते अपने समाज की हकीकत है।

जब अपने जुड़वा बेटे बेटी को सुजाता आर्ट सेंटर में लेकर आती थी तब दोनों दूसरी या तीसरी कक्षा में थे। बच्चे बहुत ही महंगी और जानी-मानी स्कुल मे पढ़ते थे। जैसे उम्र बढ़ती गई उनको अपने दोस्तों सहेलियों के माता पिता का रहन सहन पहनावा वगैरह ज्यादा पसंद आने लगा। अपनी मां के साथ बाहर जाने से कतराने लगे। सुजाता को एक दिन बेटी ने कह ही दिया कि हमें आपके साथ बाहर आने जाने में शर्म आती है। देखो मेरी सहेली कि मां कितने स्मार्ट कपड़े पहनती है्‌ं। साल्सा डान्स भी करती है। बालों को नये नये तरीके से कटवाती है। अपने बच्चों के साथ दोस्त बनकर रहती है और एक आप जो हमें बात बात पर डांटती है।

और सुजाता ने अपनेआप को बदलना शुरू कर दिया। पाश्चात्य कपड़ों ने साड़ी की जगह ले ली। घने लम्बे बालों को कटवाते वक्त बहुत रोई। हां डान्स सीखना भी शुरू कर दिया।

मध्य प्रदेश के छोटे शहर के संभ्रांत संस्कारी परिवार की यह बेटी शादी के बाद मुम्बई आई । ससुराल से लेकर पास पड़ोस में रहने वाली महिलाओं में सुजाता के सुघड़ व्यक्तित्व की चर्चा रहती थी। आज हालात से समझौता करते हुए शायद स्वयं को अजनबी महसूस करने लगी है।

उसने जाते जाते कहां दीदी आप अपनी मां को बा कहकर बुलाती थी , मैं मेरी मां को मम्मी कहती हूं और मेरे बच्चे मुझे मॉम कहकर आवाज देते हैं ।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मां से मॉम बनी हुई महिलाओं को मेरा आग्रह है कि बदलते समय के साथ ज़रुर कदम मिलाकर चले पर अपने हद़य में मां को ही बसाकर रखें जिसकी समाज को ज़रूरत है।

बाहरी आडंबर और दिखावे से व्यक्तित्व में खोखलापन आता है। हम जो है जैसे हैं उसे परिवार और समाज स्वीकार करें ऐसी कोशिश करनी चाहिए्‌। हां अगर कोई त्रुटी हो तो ठीक करनी चाहिए्‌। आधुनिकता को ज़रूर अपनाये पर सहजता से।

 

-मितुल प्रदीप, मुंबई

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