इतिहास

बन्धु की वर्षगांठ पर विशेष

औदीच्य बन्धु पत्रिका बसन्त पंचमी को अपनी वर्षगाँठ मना रही है। माघ शुक्ल पंचमी वि.सं. 1983 को मथुरा में रोपित यह पौधा, 92 वर्ष का वटवृक्ष बन चुका है। लम्बे वर्षों का यह इतिहास सफलता/असफलता, विपन्नता/ सम्पन्नता एवं संघर्ष की एक लम्बी गाथा है। वि.संवत्‌ 1938 में अहमदाबाद में औदीच्य बन्धुओं का एक बृहद्‌ सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में औदीच्य हितेच्छु सभा भारत वर्षीय ब्रह्म समाज में परिवर्तित हो गई और गुजरात/महाराष्ट्र के औदीच्य बन्धु इसके झंडे तले संगठित हो गये। कालान्तरमें उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान के औदीच्यजन भी इस दिशा में सक्रिय हुए एवं शुक्ल चिरंजीलाल, ज्यो. विभाकर द्विवेदी, श्री मनोहरलाल शुक्ल ने ब्रह्म समाज से प्रेरणा लेकर ज्यो. बाबा माधवलालजी महाराज की छत्रछाया में एक प्रान्तीय महासभा की स्थापना की, जो बाद में वर्तमान की अखिल भारतीय महासभा में परिवर्तित हो गई। संगठन एवं प्रचार की दृष्टि से महासभा को एक मुखपत्र की आवश्यकता प्रतीत हुई और महासभा की स्थापना के वर्षों बाद माघ शुक्ल पंचमी वि.सं. 1983 को औदीच्य बन्धु पत्रिका का प्रारम्भ हुआ। मथुरा से प्रकाशित इस पत्रिका के आद्य सम्पादक जोशी बाबा चन्द्रप्रकाशजी द्विवेदी थे। तीन वर्षों बाद इसकी कमान ज्यो. राधेश्याम द्विवेदी ने सम्भाली। इसके बाद सम्पादन का भार श्री बलदेव प्रसाद शर्मा, महिदपुरवासी के कन्धों पर आ गया। पं. शर्मा प्रभात प्रेस अजमेर के मैनेजर थे, अतः बन्धु अजमेर से प्रकाशित होने लगा। अजमेर से ऋणग्रस्त होकर बन्धु पुनः मथुरा आ गया और इस बार सम्पादक थे श्री चतुर्भुज पण्ड्‌या काशी। प्रकाशन के 11वें वर्ष में बन्धु को स्वयं का प्रेस मिला और श्री राधेश्याम द्विवेदी पुनः सम्पादक बने। विश्व युद्ध के कारण कागज की कमी से कुछ महीनों बन्धु का प्रकाशन स्थगित भी रहा। कई बार संयुक्त अंक निकले। श्री गोपीवल्लभ उपाध्याय, श्री भीमशंकर द्विवेदी एवं श्री गोवर्धनदास मेहता ने सम्पादक के रूप में अपनी सेवाएं दी। परिस्थिति वश बन्धु मथुरा से शुक्ल सदन अलीगढ़ से प्रकाशित होने लगा तथा सम्पादन का दायित्व डॉ. गोवर्धननाथ शुक्ल अलीगढ़ ने सम्भाला। 25वें वर्ष रजत जयन्ती अंक का प्रकाशन अलीगढ़ से ही हुआ। श्री शुक्ल की व्यस्तता के कारण बन्धु पुनः लड़खड़ाने लगा। बन्धु की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से सन्‌  56 में पू. लालजी सा. पण्ड्‌या बन्धु को इन्दौर ले आए। श्री लालजी सा. पण्ड्‌ङ्मा ने बन्धु की पूर्ण निष्ठा एवं सङ्कर्पण भाव से सेवा की एवं प्रसार, गुणवत्ता एवं आर्थिक तीनों ही ङ्कोर्चों पर सघन प्रङ्मास किङ्मे। आदरणीङ्म सुशीलकुङ्कारजी ठाकर के अविस्मरणीय सहयोग से बन्धु की गति एवं प्रगति दोनों में उल्लेखनीय सुधार हुआ। सम्पादक के रूप में  श्री रमणीकराय पण्ड्‌या, विश्वनाथ रावल श्री श्यामू सन्यासी, डॉ. मदनमोहन दुबे, श्री ओम नारायण पण्ड्‌या, श्रीमती जयाबेन शुक्ल, श्री ओम ठाकुर आदि महानुभावों ने अपनी सेवाएं दी। औदीच्य बंधु विगत करीब 63 वर्षों से इन्दौर से नियमित रूप से प्रति माह प्रकाशित होता है। स्वर्ण जयन्ती विशेषांक (1982) एवं हीरक जयंती विशेषांक (फरवरी 2002) इन्दौर से ही प्रकाशित हुए। प्रबन्धन स्तर पर श्री मनमोहन ठाकर का सहयोग भी सराहनीय रहा है। दो वर्षों से इस सेवक को सम्पादकीय प्रभार सम्भालने का अवसर प्राप्त हुआ है। प्रयास है कि पत्रिका पठनीय होने के साथ पारिवारिक पत्रिका बने। वरिष्ठ नागरिकों एवं आध्यात्मिक रसिकों के साथ महिला, बच्चों, युवाओं, कृषकों के लिए कुछ न कुछ सामग्री अवश्य हो। औदीच्य बन्धु पत्रिक के वर्तमान में करीब 2675 सदस्य हैं। इसका विस्तार म.प्र. के साथ राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली के साथ अन्य प्रान्तों में है। गत दो वर्षों में पत्रिका के 161 आजीवन सदस्य एवं 27 पांच वर्षीय सदस्य बने & मेरे कार्यकाल में विशेष संरक्षक के रूप में श्रीमती छाया शर्मा, राजपुर, श्री राजेन्द्र पण्ड्‌या, जावरा, श्री गोपीवल्लभ तिवाड़ी, जयपुर, श्री पवन कुमार दवे उज्जैन, श्री रमेशजी रावल रतलाम एवं श्री मुदित ठक्कर , इन्दौर इस परिवार से जुड़े हैं। जैसा कि आपको विदित है 10,000 रु. अथवा अधिक दान देने वाले दानदाताओं को विशेष संरक्षक सदस्य के रूप में सम्मान दिया जाता है। दो वर्षों में मुद्रण एवं व्यवस्था खर्च निकालकर बन्धु की स्थायी निधि में भी वृद्धि की गई है। महंगाई एवं जीएसटी के कारण पत्रिका के मुद्रण व्यय में लगातार वृद्धि होती जा रही है। कम प्रसार संख्या के कारण पत्रिका को पाठक तक पहुंचाने में लगभग 15 रु. प्रतिमाह व्यय होते हैं। अर्थात्‌ आजीवन शुल्क के रूप में 1500 रु. की दी जाने वाली राशि 100 माह (8 वर्ष 4 माह) में पूरी हो जाती है, किन्तु बन्धु सदस्य को मृत्यु पर्यन्त भेजा जाता है। इस अवधि को कम किया जाना न्याय संगत होगा। ऐसी स्थिति में आप पत्रिका की तीन तरह से सहायता कर सकते हैं। प्रथम इसके अधिकाधिक सदस्य बनकर/बनाकर, द्वितीय मंगल/शोक प्रसंगा पर अधिकाधिक विज्ञापन देकर एवं तृतीय दस हजार रुपए की एकमुश्त सहायता देकर विशेष संरक्षक सदस्यता प्राप्त कर। सदस्यों की वृद्धि से लागत मूल्य में कमी होगी।

सीमित पृष्ठ संख्या के कारण कई महानुभावों की रचनाओं को स्थान नहीं मिल पाता है, इसे अन्यथा न ले, हमारी आर्थिक सीमाएं हैं, क्योंकि पृष्ठ संख्या में अधिक वृद्धि से आर्थिक भार में भी वृद्धि होती है। प्रयास रहता है कि सभी अच्छी एवं सामयिक रचनाओं को स्थान मिले। लेखकों से भी आग्रह है कि ज्ञान, सामयिकता, सूचना एवं उपयोगिता का समावेश यथासम्भव अपनी रचनाओं में करें। संक्षेप रचनाए अधिक प्रभावी रहती हैं। समाचारों में अधिक नाम देने से बचें, महासभा के पदाधिकारियों, औदीच्य बन्धु सार्वजनिक न्यास के न्यासियों, प्रदेश एवं जिले के पदाधिकारियों, युवा एवं महिला ईकाईयों से अनुरोध है कि कम से कम 2 आजीवन सदस्य अवश्य बनावें। कृपया राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश के बन्धु अपनी सहभागिता में वृद्धि करें। डाक विभाग की अव्यवस्थाओं के कारण कुछ बन्धुओं को पत्रिका नहीं मिल पाती है। डाक विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखे हैं। आप भी अपने स्तर पर शिकायत कर प्रतिलिपि कार्यालयको भेजे। 11 आजीवन सदस्य बनाने वाले बन्धु को प्रति वर्ष औदीच्य दिवस पर विशेष रूप से पुरस्कृत किया जावेगा।

सुधि पाठकों का स्नेह एवं आशीर्वाद पत्रिका की अमूल्य धरोहर है। यह हमेशा बना रहे।

औदीच्य बन्धु-एक अविराम लम्बी यात्रा

-रमेश व्यास, सम्पादक

जय गोविंद माधव